ज़िन्दगी की ज़द्द-ओ-ज़हद और तुम्हारे ख्यालो के साये,किसके मुकाबिल रहू और किसको भूल जाऊँ,बेदिली सी हो चली है ज़िन्दगी से इसे जी लू या छोड़ जाऊँ,इक भरोसा उसका था इक सहारा और भी,इश्क का जनून हो या के हो तेरा बुतखाना,यू ही गुजरता तेरी रह-गुजर से या ठिठका सा रहता,इक तरफ़ तू ज़िन्दगी थी एक और ज़िन्दगी सहमी सी,उस ओर देखूं तो ग़ज़ल बने और बने रुबाई सी,ये जंग थी या के थी तेरी जुस्तजू जाना,हार के बैठा जो "मस्ताना" जुम्बिश-ए-कलम रुक सी गई....
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