शाम से ही हुआ फिर से ये दिल दीवाना क्यू है, रात का मंज़र है मुसल्सल ये आवारगी क्यू है, यू तो कई बरस बीते तेरे दर पे निगाह फेरें हुए, आज फिर से तेरे कदमो की आहट का बहाना क्यू है, फिर गई वो मई की रातें जो तडफाती कम सताती ज्यादा थी, ये गर्म हवाओं के झोंके उन दिनों की याद दिलाते क्यू है,
के फिर वही तमन्ना है बारिश में भीगने की तुम संग, जब तुमको याद नही तो तुम्हारी यादें सताती क्यू है, न एक पल भी आराम मिला "मस्ताना" तडफता ही रहा, इक बेवफ़ा के इश्क में दिल का ये सुकून जाता क्यू है..
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