अन्धेरी ऐसी ही इक रात थी वो, मै था और बस तन्हाई थी वो, शमाँ जली थी फिर से रात भर,मेरे हाल पे तमाशाई थी वो, यादों के धुंधले साये मचल रहे थे,दिल पर मक़्तल सी छाई थी वो, रोज़ कहती दिल की बातें बहकी सी,गर बढ़ाया हाथ तो हवा सी जाती थी वो, फिर भी हसरते-विशाल में जी रहा था,एक बिछड़ा हुआ साया थी वो, दिल की धड़कन बेलौस मचलती थी,रातों को करता रहा ग़ज़ल सी "मस्ताना" वो,
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