ये उलझने फिर से आ चली है दिल के कोने में, यादों के साये भी दफना चुके थे हम, है वही सिलवटें फिर से रूह-सियाह में कैसे, अल्फाज़ो की रवानी को चाक कर चुके थे हम, वो सुलगती है फिर से बरसात की रातें कैसे, बारिश की बूँदों को तो झटक चुके थे हम, आज ये फिर आँखें हुई है नम क्यू इस तरह, दिल की राहो को जब "मस्ताना" बदल चुके थे हम,
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