इन दूरियों ने भी ये क्या सितम ढाया है,जितना दूर् गए तुम उतना ही पास पाया है, जब भी लगा के पास कोई आया है,वो तुम न थी बस मेरा ही साया है, दिल की धड़कनों ने जब भी कभी तडपाया है,यु लगा के जैसे फिर से तुम्हे पाया है, ये ज़िन्दगी यु ही कट जाती तो भी कम न था,तेरी रहगुज़र ही बस मंज़िल-ए-"मस्ताना" है.
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