वक्त की भी अजब सी कहानी है समझो तो आँसू देखो तो पानी है,सितम ये ना है कि हम बेबस है दर्द ये है कि हाथों में कलम की रवानी है,हजारों साल से चली आ रही है ये दास्ताँ,कलम की जबानी फिर से सुनानी है,सुनते थे था सिकंदर इस जहां में ब्रूटस की धार फिर से दिखानी है,आज बेबस है "मस्ताना" मासूमो के रुख पर, देखेगा जहां इस किस्से को और यही बस आखिरी कहानी है..........राजेश मस्ताना

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