Friday, 10 February 2012

लोकतंत्र के चार स्तंभ,एक पुनरविलोकन!

लोकतंत्र के तीन स्तंभ,,1-व्यवस्थापिका (संसद) 2-कार्यपालिका (रास्ट्रपति) 3-न्यायपालिका (न्यायालय  चौथा स्तंभ मानक-लोक (मीडिया),,,,समय-समय पर इन्होंने अपनी महत्ता बताई है,,कुछ रोचक और यादगार पल शेयर करते है,आपको याद हो तो आप भी बताये!        संघ की कार्यपालिक शक्ति रास्ट्रपति में निहित होगी,,वस्तुतः रास्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिए बाध्य है,किंतु उच्च मान्यताये हमारे देश में सदैव बनी रही है,,यदि कोई बिल या प्रस्ताव रास्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है तो वह 1 बार उसे अपनी टीप लिख कर वापस भेज सकते है किंतु अगर वह बिल दुबारा भेजा गया तो वे स्वीकृति में हस्ताछर करने के लिए बाध्य है,,ऐसा हमारे देश में कभी नहीं हुआ कि कोई प्रस्ताव रास्ट्रपति ने लौटाया हो और वह वापस उन्हें भेजा गया हो,,जब रास्ट्रपति के.आर.नारायणन थे तो जजों की नियुक्ति का प्रस्ताव भेजा गया था किंतु उन्होंने यह कह कर लौटा दिया था कि इसमें आरक्छण का प्रावधान होना चाहिये,,हायर जुडिसरी में आरक्छण का उपबंध नहीं है फिर भी उक्त प्रस्ताव उन्हें वापस नहीं भेजा गया.........................संसद सर्वश्रेस्ठ व स्वतंत्र अपने अधिकार छेत्र में--जब सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्छ थे तब कई सांसदों को पैसा लेकर प्रश्न पूछे जाने के वीडियो प्रसारित होने पर सांसदों को अयोग्य घोसित कर दिया था,,संसद उच्चतम न्यायालय गए,,जहा सुनवाई के दौरान लोकसभा अध्य्क्छ को हाजिर होने हेतु नोटिस जारी किया,,किंतु वे अपने विशेषाधिकारों का उपयोग कर कोर्ट नहीं गए,,तब न्यायालय ने उन्हें बिना सुने निर्यण पारित किया और उनके निर्णय में हस्तछेप करने से इनकार किया,,,,,,,,,न्यायपालिका--एमर्जेंसी के दौरान नागरिकों के अधिकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार निलंबित रहते हैं,,किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने विधि की व्याख्या करने के अधिकारों का उपयोग करते हुए इस प्रावधान को"केशवानन्द भारती" के केस में असंवैधानिक घोसित किया,,और कहा कि प्रत्येक नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि उसे क्यों बंद किया जा रहा है,,,,,लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रुप में प्रभास जोशी,कन्हैया लाल नंदन,खुशवंत सिंह में से सिर्फ़ खुशवंत हैं,,,,पत्रकारिता अपने आदर्श और उच्च प्रतिमान खो चुकी है पैड न्यूज ने इस स्तंभ की साख पर बट्टा लगा दिया है,,किंतु सब कुछ कभी खत्म नहीं होता,,अब भी कुछ ऐसे पत्रकार है जिन्होने अपनी जान पर खेल कर इस स्तंभ के ढहते ढाँचे को गिरने से बचा रखा है,,हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू प्रेस परिषद के अध्यक्छ नियुक्त हुए है,,जिनसे देश को भारी अपेक्छाये है कि वे जनता(लोक) की आवाज़ को मृत होने से बचायेंगे,,,,जय हिंद-जय भारत.

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