Friday, 10 February 2012

फाँसी की सजा! देर क्यों!

..........देश में फाँसी की सजा पर काफी बहस छिड़ी हुई है,,फाँसी की सजा पाये कैदियों को सरकारी दामाद और ना जाने क्या-क्या कहा जा रहा है,,,गणतंत्र दिवस से अच्छा क्या अवसर होगा इस पर विचार व्यक्त करने के लिए,,,,मै तो कर रहा हूँ आप भी स्वस्थ चर्चा में शामिल हो सकते हैं,,,,,,,,,,,हमारे देश का क़ानून इस सुस्थापित विधिसूत्र पर आधारित है--"कि हजारों दोषी छूट जाए पर 1 निर्दोष को सजा ना हो" ये अवधारणा धीरे-धीरे हालत खराब करने लगी हमारी व्यवस्था की और दोषी छूटने लगे,,तब वर्ष 2001 के बाद से उच्चतम न्यायालय ने कहना शुरु किया कि किसी निर्दोष को सजा ना हो ये ठीक है पर दोषी को भी दंड मिलना समाज से भय दूर करने के लिए आवस्यक है,,तब परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर दोषियों को सजा मिलने का दौर प्रारंभ हुआ,,,,,,,,,,पहले और दूसरे स्वतंत्रता संग्राम के बीच 1 ऐसी घटना हुई जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी की कलई खोल दी और ब्रिटेन की रानी ने देश की कमान सीधे अपने हाथ में ले ली,,समय था बंग-भंग,बंगाल विभाजन का बंगाल के 1 सूबे के शासक राजा नंदकुमार ने बंग-भंग का विरोध किया था और इसी दौरान उनकी इंडिया के वाइसराय क्लाइव राईस से रंजिश हो गई,राईस ने राजा को झूठे हत्या के मामले में फँसा दिया,उस समय सुप्रीम कोर्ट कलकत्ता में हुआ करता था,सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अपील प्रीवी काउंसिल में होती थी जिसकी जुरी की मुखिया महारानी होती थी....राजा नंदकुमार को फाँसी की सजा हुई और सुप्रीम कोर्ट ने सजा बरकरार रखी तथा राजा को सजा के विरुद्ध अपील करने के लिए स्टे नहीं दिया गया,,उस समय सुप्रीम कोर्ट के जज थे ऐलिस इम्पे जो क्लाइव रईस के करीबी मित्र थे,,फिर भी अपील हुई,,,,राजा के वारिसो ने अपील जारी रखी,,प्रीवी काउंसिल ने राजा को बरी किया,राईस और इम्पे को बर्खाश्त किया गया,और ईस्ट इंडिया कम्पनी से महारानी ने शासन की बाग़-डोर छीन ली....किंतु अपील का फैसला आने के पहले राजा नंदकुमार को फाँसी दी जा चुकी थी,,वो दिन भारतीय ही नहीं पूरे विश्व के कानूनी इतिहास का काला दिन था,,,पर अब समय के साथ इस प्रक्रिया में तेजी आनी चाहिये,,,जय हिंद

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