Saturday, 26 May 2012

सन्दर्भ-पत्रकार अरुण त्रिपाठी की पिटाई,अनूपपुर एम.पी.

विषय-अहिंसा या क्रांति... कई दिन से हमारे मित्र गाँधी को ग़लत और क्रांतिकारियों के तरीकों को सही ठहरा रहे थे,जबकि मै लगातार ये कहाँ रहा था कि क्रांतिकारी भी गाँधीजी के कट्टर समर्थक थे..तो क्यो क्रांतिकारियों के रास्ते को सही मानने और गाँधी की बुराई करने वाले लोगो ने धरना/प्रदर्शन/ज्ञापन/माँग आदि किया जिन्हें अपना आदर्श मानते है क्यो नही उनके नक्शे-कदम पर चले..इसीलिये मैंने कहावत कही थी कि"आज हर कोई चाहता है कि भगत सिंह पैदा हो लेकिन पैदा वो पडोसी के घर में हो"...कुल मिलकर कहना आसान करना मुश्किल..जिन आदर्शो को हम अपने जीवन में अपनाना तो दूर् उस पर थोडा भी अमल नही कर सकते उन्हें लेकर व्यर्थ की बातें करना कहा तक उचित है? या ये सिर्फ़ फेसबुकिया बातें है या सिर्फ़ दूसरो की बुराई करने के छिड़-परिचित पुराने तरीके...बहुत खुल कर नही लिखना चाहता क्योकि "फेसबुकिया देश भक्त "काफी समझदार है...जय हिंद

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