मेरे अल्फाज़ो में आज ये नमी सी क्यो है,बेखबर ये दिल के पैमाने छलकते क्यू है.. खुला जो राज-ए-दिल तो महकी ये फिज़ा क्यू है,शानो पे लहराती जुल्फे आज फिर से बेचैन क्यू है.. ये खामोशी ये बेताबी सी आज रात क्यू है,यादों के डेरे में ये हलचल सी क्यू है.. वो आँखों की मासूमियत याद आती क्यू है,लिखता हू तो कलम थरथराती सी क्यू है.. जब्त किया था खूब दिल-ए-नातवान को,अब क्यो बहकता है "मस्ताना"अब सिसकता क्यू है.........राजेश मस्ताना
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