हर किसी ने हर दौर में जब भी कभी ग़ज़ल-ओ-रूबाईयात का ज़िक्र किया मिर्जा ग़ालिब हर बयाँ का किरदार बने रहे,आगरा में जन्मे मिर्जा दिल्ली की शाह-ए-चमन का नूर और हिंदुस्तान के आम-ओ-ख़ास के दिल का फितूर बने रहे,ये सच है कि किसी इनसान की जीते जी जो क़द्र नही होती गालिबन फना होने के बाद वो अपने दायरे में रहे इंसानो के दिल का नूर बना जाता है.ग़ालिब भी दुनिया के इस दस्तूर से अलग ना राह सके ये सच है कि ग़ालिब का अंदाज़-ए-बया कैसे फिर भी उनकी दर्द भरी ज़िन्दगी पर लिखने की मैंने भी ठानी पर ये न सूझा कि शुरुआत कहा से करू गम से या खुशी से पर "जब इब्तिदा की तो बस लिखता ही चला गया,कलामे-बया अपने खुद-ब-ख़ुद होता गया" पन्नो में मिर्जा को समेटना तो नामुमकिन है (क्योकि कहा जाता है कि "गदर" के बाद जब बहादुर शाह "ज़फर" को कालापानी भेज दिया गया तो महफिले बंद और किले की रौनक खत्म हुई कमाने-खाने की आदत तो शाही शायर होने के नाते कभी थी नही ऊपर से मयकशी की लत फिर भी उनकी शायरी के दीवाने कम न थे मयखाने में उनकी एक नई गज़ल पर शाम की मयकशी मुफ्त हो जाया करती थी) पर कोशिश तो की जा सकती है क्योकि यह और भी सच है कि शायर तो किताबो में बिखरता है और पन्नो में बसता है,किसी शायर ने क्या खूब कहा है कि "तुझसे बिछडा तो मै किधर जाऊंगा,मै तो शायर हूँ किताबो में बिखर जाऊंगा" मेरा ये कलम नामा ग़ालिब की कहानी कम और उनके शेरो-गज़ल से निकली दास्तान ज्यादा है.शान-ओ-शौकत में पले बढे मिर्जा ने अपनी तमाम उम्र परेशानियो में उलझ कर गुजारी,शादी शुदा मिर्जा ज़िन्दगी की ऊब को दूर करने के लिए ईश्क़ भी किया और ईश्क़ में वो सब कुबूल किया जो राजो-नियाज में हमेशा से होता आया है,महबूबा से छेडछाड करते हुए कहते है कि-यार से छेड़ चली जाय असद,न सही वसाला तो हसरत ही सही, बोसा देते नही और दिल पे है हर पल निगाह,दिल में कहते है कि मुफ्त में आए तो माल अच्छा है. छेड़-चाँद कराते वक्त यार की बदगुमानी से भी वो बे-आसना न थे "ले तो लू सोते में उसके पाव का बोशा मगर,अइसी बातों से वो काफिर बदगुमां हो जायेगा" बदगुमानी को बेपरदा करते हुए वे ये भी कहते है कि "हमने माना कि तगाफुल न करोगे हरगिज,खाक हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक." शायर तो उनके लबो पर मचलते रहते थे और सुनाने वाला उन्हें फौरन ही क़लमबंद कर लेता था.इज़हारे इश्क की लगान में वो तड़फ के कहते थे-उधर वो बदगुमानी है इधर ये नातवानी है,न पूछा जाए है उनसे न बोला जाय है हमसे.....आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक,कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ के सर होने तक.....अपनी महबूबा पअर वे जब भी अल्फाज का जादू डालते थे तो वह् हमेशा शर्मिन्दा हो जाती थी तब वो हँस के कहते-"की मेरे कत्ल के बाद उसने जफा से तौबा,हाय उस ज़ूद-पशेमा का पशेमा होना" अपनी महबूबा को पैग़ाम देने की कहने वाले को वे कहते कि-"तुझसे तो कुछ कलाम नही लेकिन ऐ नदीम,मेरा सलाम कहियो अगर नंबर मिलें" फिर-"खत् से बढ़ कर है मुझे दीदार की लगान,मै भी चला चालू न इसी नामबर के साथ" खूबसूरती के शायर मिर्जा उस पर भी ताकीद करते कि-"ज़िक्र उस परीवश का और फिर बया अपना,बन गया रकीब आख़िर था जो राजदा अपना" इश्क की असलियत को भी वो बेनकाब करते है-"मोहब्बत में नही फर्क जीने और मरने का,उसी को देख के जीते है जिस काफिर पे दम निकले" इसके बावजूद दिल से मजबूर हसरते वस्ल में तड़पते मिर्जा जोश-ओ-शुकून से कहते है--"हमारे जेहन में इक फिक्र का नाम है विशाल,कि गर न हो तो जाए कहा हो तो क्यो कर हो" अपनी तड़प को समझते पर महबूब के लिए दुआ भी करते --"जान तुम पर निसार करता हूँ,मै नही जानता कि दुआ क्या है" गम से न कभी वो दूर थे और न ही बेनियाज होना चाहते थे-"कैदे-हयात-ओ-बन्दे-गम असल में दोनों एक है,मौत से पहले आदमी गम से नजात पाये क्यो" शराब के इंतिहाई शौकीन मिर्जा दिन-रात पीते थे और जब कभी उनकी माशूका मना करती तो वो कहते कि--"मै और बज़्म-ए-मय से यू तर ना काम आऊ,गर मैंने की थी तौबा साकी को क्या हुआ था" जब मयकशी के लुत्फ के बारे में कोई पूछता तब वो कहते--"मय से गरज निशात है किस रूसियाह को,इक गुना बेखुदी मुझे दिन रात चाहिये" पैसे की तंगी और लोगो के टनों से तंग आकर चंद दिनों के लिए शराब छोडी तो भी ख़ुद को भरोसा न हुआ--"ग़ालिब छूटी शराब पर अब भी कभी-कभी,पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-माहताब में" और फिर चंद दिनों बाद मयकशी का दौड़ फिर से शुरू--"साकीगरी की शर्म करो आज वर्ना हम,हर शब ही करते है मय जिस क़दर मिलें" वो शराब से तौबा कराने वाले वैज़-ओ-शेख पर फब्तियां भी कसते--"कहा मयखाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहा वाईज़,पर इतना जानते है कल वो जाता था कि हम निकले" उन्होंने ज़िन्दगी के हर पहलू को अपने शेरो-ग़ज़ल में तौला चाहे वो गम-ए-ज़िन्दगी हो जन्नत की ख्वाहिश,आशियाना हो के उस पे गिर रही बराक,जफा हो के हो वफ़ा की जुस्तजू--"ग़मे हस्ती का असद किस से हो ज़ुज़मर्ग इलाज,शमा जलती है शहर होने तक" उम्र की दीवारों को पर करते हुए मिर्जा धीरे-धीरे अपनी ज़िन्दगी के साहिल पर पहुँच रहे थे पर उस उम्र में भी मिर्जा ने अपनी रंगीनियां कं नहोने दी --"इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले है तो क्या,हठ आए तो उन्हें हठ लगाए न बने" उनके दोस्त और उस दौड़ के एक और महान शायर "जोक" उनकी इन रंगीनियों से अकसर खफा होते एक बार जब वो बीमार थे तब मिर्जा साहब उनका हाल पूछने गए वहा जाने पर उन्होंने "जोक"का हाथ पकडा और लुत्फ लेते हुए कहा--"नाकर्दा गुनाहों को भी हसरत की मिलें दाद,या रब अगर इन कर्दा गुनाहों की सजा है" तब जोक ने भी चिढ़ कर जवाब दिया--"क्या देखता है हाथ मेरा छोड़ दे ग़ालिब,या जान ही बदन में नही नब्ज क्या चले" हाजिर जवाब मिर्जा ने उसी लहजे में तपाक से जवाब दिया--"वा गया भी मै तो उनकी गलियों का क्या जवाब,याद थी जितनी दुआये सर्फ-ए-दरबा हो गई" और इस तरह शेरो-शायरी का जो शमा बंधा तो वो सुबह होने तक चलता रहा,किसने देखा और किसने सुना होगा इन हस्तियों का अंदाज़-ए-बया,बा गालिबन ये उनकी आखिरी बज़्म थी जिसमे वे तनबोश हो कर बोले,इसके बाद किसी बज़्म में शिरकत नही की और तनहाइयों में दिन गुजरते हुए रुखशत के दिन का इंतज़ार करते रहे और उनकी संजीदा आँखें,बोझिल पलके खुदाई नूर बरसाती रही--"गो हाथ को जुम्बिश नही आँखों में तो दम है,रहने दे सागर-ए-मीना मेरे आगे" उनकी इस हालत पर शायर "मीर" ने कई शेर लिखे --"कदम जमा न सका बहाव ऐसा था,के धँस के रह गया साहिल कटाव ऐसा था,वो एक उम्र से टूटा था अन्दर से,किसी पे खुल न सका,रख-रखाव ऐसा था" और आखिरकार तिहत्तर बरस की उम्रमें वह् बेमिसाल हस्ती ज़िन्दगी के साहिल में धँस गई ,पर उससे जो गुबार उठा वो आज के दौड़ में भी हर आम-ओ-ख़ास के दिल पर छाया हुआ है,हर शख्श यही कहता नजर आता है कि ऐ ग़ालिब ताकयामत इस कायनात में तेरा इक-इक हर्फ चमकता नजर आयेगा,सूरज चाँद सितारों की चमक भी तेरे हरफों की चमक कं न कर सकेगी...."मै सोता हूँ और जागता हूँ और जग के फिर सो जाता हूँ,सदियों का पुराना खेल हूँ मै,मै मर के अमर हो जाता हूँ.. मेरा यह कालम वर्ष 1995 में दैनिक " देश-बंधु-सतना" में प्रकाशित हो चुका है,पुरानी डायरी के कुछ अंश आपसे बाँट रहा हूँ,हौसलाफजाई चाहूंगा आपका राजेश "मस्ताना"
Monday, 28 May 2012
अंदाज़-ए-बयाँ
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bahut achchhe !
ReplyDeleteधन्यवाद सत्याजी हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया
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